मंगलवार, अगस्त 21"Satyam Vada, Dharmam Chara" - Taittiriya Upanishad

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संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

https://www.youtube.com/watch?v=gLfm0Neh8Xc?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 संत रैदास जी का एक यह हैं, जब उनको दबाव डाला गया कि तुम इस्लाम क़ुबूल करो तो उन्होंने लिखा :- वेद धरम सबसे बड़ा अनुपम सच्चा  ज्ञान I फिर मैं क्यों छोड़ू इसे पढ़लू झूट कुरान वेद धरम छोड़ू नहीं कोसिस करो हज़ार I तिल तिल काटो चाही गौदो अंग कतार I अब यह बताईये कि जो समाज में सबसे निचली श्रेणी में खड़े हैं वह कहतें हैं वेद,धरम सबसे बड़ामैं इसे किसी भी कीमत पर त्याग नहीं सकता I क्योकि वह जो अनुपम ज्ञान हैं और आप कहतें हैं कि छोटी जातियों के साथ इतना अन्याय हुआ I अगर अन्याय हुआ होता तो क्या रैदास वेद धरम और कहतें हैं कि तुम मेरा अंग काटो ? चाहे कटार से गोत दालों तभी मैं नहीं त्यागूंगा ?
रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

https://www.youtube.com/watch?v=BFGiGXKAjs8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 स्वामी रामानंद ने “वैष्णव मताब्ज भास्कर” में लिखा हैं : प्राप्तम पराम सिद्धधर्मकिंचनो जानो द्विजातिरछां शरणम हरीम व्रजेत परम दयालु स्वगुणानपेक्षित क्रियाकलापादिक जाती बन्धनं सिद्धि प्राप्ति के लिए धन का कोई महत्त्व नहीं है, जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह किसी भी जाती, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, हरी के शरण में जाने का अधिकारी है I कमर्काण्ड और जाती बंधन का कोई अर्थ ही नहीं है I आगे देखिये वह क्या कहतें है I वो कहतें हैं कि पंचायुध चिन्ह से युक्त कोई भी व्यक्ति जिसके शरीर पर पंचायुध में से किसी एक आयुध का निशान हैं, वह साक्षात विष्णु का रूप है I वह पवित्र से पवित्र व्यक्ति को पावन कर सकता है I तो क्या स्वामी जी शक्त-अशक्त, संपन्न-विफन्नं, शिक्षित- निरक्षर, ब्राह्मण-शूद्र, राजा- रैंक, चांडाल, स
कबीर का रामानंद जी का शिष्य न होने का दावा

कबीर का रामानंद जी का शिष्य न होने का दावा

https://www.youtube.com/watch?v=hQouELgLHA8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर पर सबसे सुन्दर किताब लिखी हैं I निर्विवाद रूप से उनकी किताब सबसे अधिक शोध और गहन अध्ययन के बाद लिखी गयी है, और वैसे भी हम जैसे लोग या हमारे साथ जितने भी काम करने वाले हैं, वह आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी पर टिपण्णी करने का अधिकार नहीं रखतें हैं, ना हम उसके योग्य हैं, ना हम कुछ कर सकतें हैं I उनकी विद्वता जो हैं प्रमाणित हैं I तो उन्होंने कबीर पर जो किताब लिखी हैं, उसमे उन्होंने कई सारी पंक्तियाँ हैं, लेकिन एक मूल पंक्ति यह हैं की: रामानंद प्रवर्तित रामभक्ति धरा I कबीर में एक रूप धारण करती है और तुलसीदास में दूसरा रूप धरती है आगे उन्हों और विशद व्याख्या को हैं I कबीर जो की बार-बार गुरु की महिमा हैं का गान करतें हैं, वह कहतें है : पीछें लागा जाई था लोक बेद का साथी आगे थे
निराला की कविता – तुलसीदास

निराला की कविता – तुलसीदास

https://www.youtube.com/watch?v=joaf8HLx0js&t=20s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 हिंदी के महान कवी निराला ने एक कविता लिखी हैं तुलसीदास के ऊपर I उस कविता की चर्चा  साहित्य की आलोचना का जो जगत हैं, उसमे गुम हैं I कोई इस पर बात नहीं करता हैं I बात करता भी हैं  तो दबी-छुपी ज़ुबान में I जबकि अज्ञेय ने १९४० के उत्तरार्ध में कहा था कि जब मैंने निराला की बड़ी और लम्बी कवितायेँ पढ़ी, “राम की पूजा”, “सरोज-स्मृति”, तब उतना उज्वलित नहीं हुआ था जितना की “तुलसीदास” कविता पढ़ने के बाद हुआ, और ऐसी रचनाएँ जो विरली होती हैं, जिनमे पूरी संस्कृति चलचित्र की तरह आपके सामने चलती हैं, भावुक रचनाएँ तो बहुत सारी होती हैं I “तुलसीदास” कविता में उन्होंने उस युग का वर्णन किया हैं और लिखा हैं उन्होंने…. चुकी कवी निराला के प्रिय कवी तुसली थे रविंद्र नाथ, उनके प्रिय कवी थे, तुलसी उनके प्रिय कवी थे, ग़ालिब भ
रामनादाचार्य के १२ प्रमुख शिष्य

रामनादाचार्य के १२ प्रमुख शिष्य

https://www.youtube.com/watch?v=V3A_IRrECkg?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 स्वामी रामानन्द जगह-जगह से तीर्थ करके जब वापस लौटे, तब उन्होंने यह निर्णय लिया कि इस भयावह समस्या से निपटने  लिए, दूसरे स्तर पर युद्ध करना होगा I सांस्कृतिक युद्द, धार्मिक युद्द I उन्होंने अपने जो गुरु भाई थे, उनसे अलग हटकरके एक नया पन्थ शुरू किया I पंथ मूलतः वह सनातन का ही है, वह हिन्दू धर्म का ही है, मूल पंथ वही है, लेकिन जो कुछ कथित पोंगा पंडित थे उनसे हटे वे, और उन्होंने अपने शिष्य बनाये I उनके हज़ारों शिष्य बने, जात -पात की तो कोई बंदिश ही नहीं थी I और १२ जो सबसे प्रमुख शिष्य बने जिन्हे कि “द्वादश महाभागवत” कहा जाता है I आप देखिये, इस शब्द पर ध्यान दीजिये, द्वादश महाभागवत I वो जो बारह शिष्य हैं, उनमे कबीर है, जो जाती से चुलाहा हैं, उनमे रैदास हैं जो चर्मकार है, उसमे धन्ना है, जो जाती से जाट है, लेकिन क
घर वापसी में रामानंद जी का योगदान

घर वापसी में रामानंद जी का योगदान

https://www.youtube.com/watch?v=KObhh12mrY0?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 जो लोग रामानंद को काटते हैं, जो लोग रामानंद से कबीर को अलग कर देते हैं, उनका पूरा agenda ही इसी line पर चलता हैं के, वे आपको ...आपके सामने कुछ ऐसा तर्क नहीं देंगे ऊल -जलूल type की बातें करेंगे I लेकिन रामानंद जी का योगदान बहुत ज़्यादा हैं इसलिए, क्योकि क्योकि आगे देखिये जो उन्होंने कार्य किया वह किसी और ने नहीं किया था I एक योद्धा संत का कार्य हैं I दरअसल उस समय जो समाज में...हम slide को आगे बढ़ाएंगे…प्रचलित जो था, कि हिन्दू जिसके गले पर तलवार रख दी जाती थी, वह तो मुसलमान बनने के लिए बाध्य था I उसके पास और कोई चारा नहीं था, या तो मर गया, कट गया या, जल गया या फिर क्या करेगा, मुसलमान ही बनेगे, उसके पास तो कोई चारा नहीं था I लाखों की तादात में धर्म परिवर्तन हुआ I धर्म परिवर्तन हुआ तो...लेकिन हिन्दू जो अप
शंकराचार्य के बारे में जानना आवश्यक क्यों है ?

शंकराचार्य के बारे में जानना आवश्यक क्यों है ?

https://www.youtube.com/watch?v=rBySaPAfiJg?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 भगवान् शंकराचार्य को जानना अवतार परंपरा को जानना है, सनातन धर्म की I भगवान् शंकराचार्य को जानना , unity in diversity को जानना है I भगवान् शंकराचार्य को जानना national integration को जानना है, भगवान् शंकराचार्य को जानना social reform को जानना है, समाज सुधार को जानना है I भगवान् शंकराचर्या को जानना सनातन धर्म की पुनर संस्थापना को जानना है I ढाई हज़ार वर्ष से वर्त्तमान तक सतत, नित्य निरंतर, अनवरत रूप से सनातन धर्म के प्रशस्थ मानबिन्दुओं की रक्षा करने का श्रेय अगर किसी को जाता हैं, तो वह जाता है शंकराचार्य परंपरा को I शंकराचार्य परंपरा अगर न होती, भगवान् शंकराचार्य का अवतार न हुआ होता तो, इन ढाई हज़ार वर्षों में सनातन धर्म की क्या दुर्गति हुई होती यह समझा जा सकता है I १७ बार invasion होते हैं हम पे I १७ ब
आदी शंकर की परंपरा के कालक्रम को अंग्रेजों ने क्यों विकृत किया ?

आदी शंकर की परंपरा के कालक्रम को अंग्रेजों ने क्यों विकृत किया ?

https://www.youtube.com/watch?v=PgAT8WTSsaU?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 अंग्रेजों को मालूम था, कि जब-जब इतिहास की समीक्षा होगी तब-तब हमको Villan के रूप में देखा जायेगा I क्योकि हमने यहाँ पे इतने लूट-पाट कर लिए हैं, ऐसे-ऐसे नरसंहार किये हैं यहाँ पे, कि जब-जब इतिहास की समीक्षा होगी तब-तब हमको खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा I अच्छा, अँगरेज़ यह भी जानतें थे कि इनकी विचारधारा का स्त्रोत क्या हैं? इनके ideology का स्त्रोत क्या हैं? कहाँ से ideology मिलती हैं, इनको ? यह लोग वोह लोग हैं ढाई हज़ार साल से दमन, शोषण, अत्याचार झेल रहें हैं ये, सांकृतिक लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं यह लोग, वैचारिक युद्द, सांस्कृतिक युद्द, शस्त्र युद्द, उसके बाद भी समाप्त नहीं होती इनकी सभ्यता और संस्कृति फिर flourish करना चालु हो जातें हैं, यह फिर से जगत गुरु और विश्व गुरु हो जातें हैं, यह फिर से सोने की चिड़िया
भगवान् शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ

भगवान् शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ

https://www.youtube.com/watch?v=x2ko_RDhLFc?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 भगवान् शंकराचार्य जानते थे, कि उनके जाने के बाद भी, भारत के ऊपर शस्त्र युद्द, वैचारिक युद्द और सांस्कृतिक युद्द थोपे जायेंगे I जानते थे वोह इस बात को, इसीलिए, भगवान शंकराचार्य ने चार वेदों की रक्षा के लिए, भारत की चार दिशाओं में, चार आम्नाय मठो की स्थापना करी, आम्नाय का मतलब होता हैं, वेद I और आम्नाय पीठ का मतलब होता हैं वैदिक पीठ I तो चार आम्नाय पीठों की स्थापना करी भगवन शंकराचार्य ने, भारत की चार दिशाओं में I चार वेदों की रक्षा के लिए और चार धामों की रक्षा के लिए I भगवान् शंकराचार्य ने उत्तर दिशा में श्री उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ की स्थापना करी I और ज्योथिर्माथ का वेद जो हैं, वोह अथर्व वेद हैं, यानी जो ज्योतिर्मठ जो है, अथर्व वेद के जो सहिताएं हैं, जो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं, जो आरण्यक ग्रन्थ हैं, जो उपनिषद्
भगवान् शंकराचार्य का अवतरण काल

भगवान् शंकराचार्य का अवतरण काल

https://www.youtube.com/watch?v=1_k8MRzuse8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 पूरे facts और evidences के आधार पे हमारे पास तथ्य, प्रमाण, साक्ष और आंकड़े हैं जो यह बतातें हैं कि भगवन शंकराचार्य का अवतरण इसवी सन से ५०७ वर्ष पूर्व सिद्ध होता हैं I अब मैं आपको वोह timeline निकालके इसमें बताना चाहता हूँ, मैं आपको बता देता हूँ I भगवान् शंकराचार्य ने राजपीठ की जो स्थापना करी थी, उसके लिए उन्होंने, सम्राट सुधन्वा को अखंड भारत का राज सिंहासन समर्पित किया था, और सम्राट सुधन्वा की भूमिका जो हैं शंकर दिगविजय में, वोह कोई छोटी-मोटी भूमिका नहीं हैं I सम्राट सुधन्वा ने मेहती भूमिका निभाई हैं शंकर दिग विजय के अभियान में, भगवान् शंकराचार्य के I भगवान् शंकराचार्या के निजधाम, कैलाश गमन, जो कि ३२ वे वर्ष में सिद्ध होता हैं, भगवान् शंकराचार्य के निजधाम कैलाश गमन के एक माह पूर्व, यानी एक महीने पहले, सम्