मंगलवार, मई 21"Satyam Vada, Dharmam Chara" - Taittiriya Upanishad

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धार्मिक ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं है

धार्मिक ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं है

https://www.youtube.com/watch?v=-tFbVwUqqlU&t=5s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 हम एक ऐसी सभ्यता हैं जिसके मूल में ज्ञान की बृहत् खोज करना है। हिन्दू धर्म जैसा कोई और धर्म नहीं है। यह ज्ञान परंपराओं की धारा का एक समूह है जिसमे आंतरिक और बाह्य दोनों दुनिया के ज्ञान की खोज चल रही है। वस्तुतः हम सदा से ऐसे ही थे जिसके अंतर्गत हम इन दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान में थे। इसलिए मौलिक रूप से हम ज्ञान परंपरायें हैं जो कई अलग-अलग तरीकों से प्रेषित होती हैं, क्योंकि ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित नहीं करना पड़ता है। आप अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखाते हैं। क्या आप उसे इसके लिए किताब देते हैं? सीखने के विभिन्न तरीके हैं, ग्रंथ भी एक तरीका हो सकता है, लेकिन ग्रंथ ही एकमात्र तरीका नहीं है। और यह निश्चित रूप से प्रमुख तरीका नहीं है। आज भी मनुष्य मूलत: अवलोकन, पुनर
शिव आगम का अवतरण कैसे हुआ?

शिव आगम का अवतरण कैसे हुआ?

https://www.youtube.com/watch?v=3Tw4IaqZxeE&t=5s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 शिव आगम वे आगम हैं जो स्वयं महादेव द्वारा प्रकट किए गए थे। कामिका आगम, जो सबसे महत्वपूर्ण अगमों में से एक माना जाता है, में इसका वर्णन पाया जाता है। इसमें महादेव को पंचमुख के रूप में वर्णन किया गया है - सद्योजात, वामदेव, अघोरा, तद्पुरुष और ईशान। महादेव के इन चेहरों में से प्रत्येक में पांच और मुख थे। इन पाँच में से प्रत्येक मुख से लौकिक, वैदिक, आध्यात्मिक, अतिमार्ग और मंत्र आगम प्रकट हुए। ये केवल नाम नहीं हैं, बल्कि आगम की श्रेणियां हैं। इस प्रकार कुल 25 मुख बनते हैं। सद्योजात मुख से 24 रूपों वाला भूत तंत्र (उदाहरण - कौल तंत्र) प्रकट हुआ। वामदेव मुख से 24 रूपों वाला वामतंत्र प्रकट हुआ; अघोर मुख से भैरव तंत्र प्रकट हुआ; तत्पुरुष मुख से 24 रूपों वाला गरुड़ तंत्र और इशान मुख, जो सबसे महत्वपूर्ण है औ
[Q&A] ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ एवं ‘आयुर्वेद का महत्व’

[Q&A] ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ एवं ‘आयुर्वेद का महत्व’

गुरुकुल शिक्षा पद्धति': https://youtu.be/Y3zYBxpm0iU क्या थी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली? कितनी प्रकार की पद्धतियाँ होती थीं इस प्रणाली में? कहाँ से आरम्भ होती थी शिक्षा? क्या शिक्षा केवल विषय-ज्ञान तक सीमित थी या इसका कोई अलौकिक अभिप्राय भी था? जानिए श्री मेहुल आचार्य के व्याख्यान में | आयुर्वेद का महत्व : https://youtu.be/UixTp3YiFHI आयुर्वेद के अनुसार आहार ही औषधि है| श्रीमती जिज्ञासा आचार्य हमें बता रही हैं किस प्रकार पदार्थों के गुणों के अनुकूल पथ्य-अपथ्य का पालन आवश्यक है; कैसे भोजन पकाते समय न केवल पात्रों, पदार्थों तथा स्थान की स्वच्छता व शुद्धता महत्त्वपूर्ण है, अपितु पकाने वाले के भाव की शुद्धता और पवित्रता उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं जो हमारे भोजन को, हमारे स्वास्थ्य को और अंततः हमारे मन को प्रभावित करते हैं| https://www.youtube.com/watch?v=jVw5xFwc8Wc?cc_lang_pref=hi&cc_
इसाई पंथ और भारत – डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन का व्याख्यान

इसाई पंथ और भारत – डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन का व्याख्यान

संपूर्ण विश्व में प्रेम व शान्ति का स्वरुप माने जाने वाले इसाई धर्म के विस्तार का इतिहास रक्त से सना है, ये तथ्य कम ही लोग जानते हैं| यूनान, रोम व माया जैसी कई प्राचीन संस्कृतियाँ इसाई मिशनरियों के हाथों जड़ से मिटा दी गयीं| अनगिनत देशों की भोली-भाली प्रजा का जबरन धर्मान्तरण किया गया और जो न माने उन्हें अत्यंत बर्बरता से प्रताड़ित कर मौत के घाट उतार दिया गया| भारत में सर्वप्रथम इसाई शरणार्थी बन कर आये| परन्तु पुर्तगालियों के आगमन के साथ ‘गोवा इन्क्विज़िशन’ नामक क्रूरता का जो वीभत्स नरसंहार शुरू हुआ वो दिल दहलाने वाला था| उसके पश्चात् फ्रांसीसी, डच, अंग्रेज़, ये सभी विदेशी इसाई धर्म के विस्तार के लिए निर्दोष भारतवासियों पर अत्याचार करते रहे| अपने सृजन व्याख्यान “इसाई पंथ और भारत” में श्री सुरेन्द्र जैन बड़ी स्पष्टता से हमें अवगत कराते हैं कि किस प्रकार आज़ादी के पश्चात् इसाई मिशनरी छल-बल,
संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

https://www.youtube.com/watch?v=gLfm0Neh8Xc?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 संत रैदास जी का एक यह हैं, जब उनको दबाव डाला गया कि तुम इस्लाम क़ुबूल करो तो उन्होंने लिखा :- वेद धरम सबसे बड़ा अनुपम सच्चा  ज्ञान I फिर मैं क्यों छोड़ू इसे पढ़लू झूट कुरान वेद धरम छोड़ू नहीं कोसिस करो हज़ार I तिल तिल काटो चाही गौदो अंग कतार I अब यह बताईये कि जो समाज में सबसे निचली श्रेणी में खड़े हैं वह कहतें हैं वेद,धरम सबसे बड़ामैं इसे किसी भी कीमत पर त्याग नहीं सकता I क्योकि वह जो अनुपम ज्ञान हैं और आप कहतें हैं कि छोटी जातियों के साथ इतना अन्याय हुआ I अगर अन्याय हुआ होता तो क्या रैदास वेद धरम और कहतें हैं कि तुम मेरा अंग काटो ? चाहे कटार से गोत दालों तभी मैं नहीं त्यागूंगा ?
रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

https://www.youtube.com/watch?v=BFGiGXKAjs8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 स्वामी रामानंद ने “वैष्णव मताब्ज भास्कर” में लिखा हैं : प्राप्तम पराम सिद्धधर्मकिंचनो जानो द्विजातिरछां शरणम हरीम व्रजेत परम दयालु स्वगुणानपेक्षित क्रियाकलापादिक जाती बन्धनं सिद्धि प्राप्ति के लिए धन का कोई महत्त्व नहीं है, जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह किसी भी जाती, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, हरी के शरण में जाने का अधिकारी है I कमर्काण्ड और जाती बंधन का कोई अर्थ ही नहीं है I आगे देखिये वह क्या कहतें है I वो कहतें हैं कि पंचायुध चिन्ह से युक्त कोई भी व्यक्ति जिसके शरीर पर पंचायुध में से किसी एक आयुध का निशान हैं, वह साक्षात विष्णु का रूप है I वह पवित्र से पवित्र व्यक्ति को पावन कर सकता है I तो क्या स्वामी जी शक्त-अशक्त, संपन्न-विफन्नं, शिक्षित- निरक्षर, ब्राह्मण-शूद्र, राजा- रैंक, चांडाल, स
कबीर का रामानंद जी का शिष्य न होने का दावा

कबीर का रामानंद जी का शिष्य न होने का दावा

https://www.youtube.com/watch?v=hQouELgLHA8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर पर सबसे सुन्दर किताब लिखी हैं I निर्विवाद रूप से उनकी किताब सबसे अधिक शोध और गहन अध्ययन के बाद लिखी गयी है, और वैसे भी हम जैसे लोग या हमारे साथ जितने भी काम करने वाले हैं, वह आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी पर टिपण्णी करने का अधिकार नहीं रखतें हैं, ना हम उसके योग्य हैं, ना हम कुछ कर सकतें हैं I उनकी विद्वता जो हैं प्रमाणित हैं I तो उन्होंने कबीर पर जो किताब लिखी हैं, उसमे उन्होंने कई सारी पंक्तियाँ हैं, लेकिन एक मूल पंक्ति यह हैं की: रामानंद प्रवर्तित रामभक्ति धरा I कबीर में एक रूप धारण करती है और तुलसीदास में दूसरा रूप धरती है आगे उन्हों और विशद व्याख्या को हैं I कबीर जो की बार-बार गुरु की महिमा हैं का गान करतें हैं, वह कहतें है : पीछें लागा जाई था लोक बेद का साथी आगे थे
निराला की कविता – तुलसीदास

निराला की कविता – तुलसीदास

https://www.youtube.com/watch?v=joaf8HLx0js&t=20s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 हिंदी के महान कवी निराला ने एक कविता लिखी हैं तुलसीदास के ऊपर I उस कविता की चर्चा  साहित्य की आलोचना का जो जगत हैं, उसमे गुम हैं I कोई इस पर बात नहीं करता हैं I बात करता भी हैं  तो दबी-छुपी ज़ुबान में I जबकि अज्ञेय ने १९४० के उत्तरार्ध में कहा था कि जब मैंने निराला की बड़ी और लम्बी कवितायेँ पढ़ी, “राम की पूजा”, “सरोज-स्मृति”, तब उतना उज्वलित नहीं हुआ था जितना की “तुलसीदास” कविता पढ़ने के बाद हुआ, और ऐसी रचनाएँ जो विरली होती हैं, जिनमे पूरी संस्कृति चलचित्र की तरह आपके सामने चलती हैं, भावुक रचनाएँ तो बहुत सारी होती हैं I “तुलसीदास” कविता में उन्होंने उस युग का वर्णन किया हैं और लिखा हैं उन्होंने…. चुकी कवी निराला के प्रिय कवी तुसली थे रविंद्र नाथ, उनके प्रिय कवी थे, तुलसी उनके प्रिय कवी थे, ग़ालिब भ
रामानंदाचार्य के १२ प्रमुख शिष्य

रामानंदाचार्य के १२ प्रमुख शिष्य

https://www.youtube.com/watch?v=V3A_IRrECkg?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 स्वामी रामानन्द जगह-जगह से तीर्थ करके जब वापस लौटे, तब उन्होंने यह निर्णय लिया कि इस भयावह समस्या से निपटने  लिए, दूसरे स्तर पर युद्ध करना होगा I सांस्कृतिक युद्द, धार्मिक युद्द I उन्होंने अपने जो गुरु भाई थे, उनसे अलग हटकरके एक नया पन्थ शुरू किया I पंथ मूलतः वह सनातन का ही है, वह हिन्दू धर्म का ही है, मूल पंथ वही है, लेकिन जो कुछ कथित पोंगा पंडित थे उनसे हटे वे, और उन्होंने अपने शिष्य बनाये I उनके हज़ारों शिष्य बने, जात -पात की तो कोई बंदिश ही नहीं थी I और १२ जो सबसे प्रमुख शिष्य बने जिन्हे कि “द्वादश महाभागवत” कहा जाता है I आप देखिये, इस शब्द पर ध्यान दीजिये, द्वादश महाभागवत I वो जो बारह शिष्य हैं, उनमे कबीर है, जो जाती से चुलाहा हैं, उनमे रैदास हैं जो चर्मकार है, उसमे धन्ना है, जो जाती से जाट है, लेकिन क
घर वापसी में रामानंद जी का योगदान

घर वापसी में रामानंद जी का योगदान

https://www.youtube.com/watch?v=KObhh12mrY0?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 जो लोग रामानंद को काटते हैं, जो लोग रामानंद से कबीर को अलग कर देते हैं, उनका पूरा agenda ही इसी line पर चलता हैं के, वे आपको ...आपके सामने कुछ ऐसा तर्क नहीं देंगे ऊल -जलूल type की बातें करेंगे I लेकिन रामानंद जी का योगदान बहुत ज़्यादा हैं इसलिए, क्योकि क्योकि आगे देखिये जो उन्होंने कार्य किया वह किसी और ने नहीं किया था I एक योद्धा संत का कार्य हैं I दरअसल उस समय जो समाज में...हम slide को आगे बढ़ाएंगे…प्रचलित जो था, कि हिन्दू जिसके गले पर तलवार रख दी जाती थी, वह तो मुसलमान बनने के लिए बाध्य था I उसके पास और कोई चारा नहीं था, या तो मर गया, कट गया या, जल गया या फिर क्या करेगा, मुसलमान ही बनेगे, उसके पास तो कोई चारा नहीं था I लाखों की तादात में धर्म परिवर्तन हुआ I धर्म परिवर्तन हुआ तो...लेकिन हिन्दू जो अप