शुक्रवार, नवम्बर 16"Satyam Vada, Dharmam Chara" - Taittiriya Upanishad

लेखक: SrijanFoundationStaff

भारत की मूलभुत मूल्य प्रणाली

भारत की मूलभुत मूल्य प्रणाली

भगवान की उदार आस्था भारत में जड़ में है। हिंदू धर्म की जड़ में 'ब्राह्मण' एक विचार है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद नहीं किया जा सकता है। ब्राह्मण विचार एक ऐसी विशिष्ट चेतना है जिसे हम सभी ब्रह्मांड में देखते हैं (और जो सभी अस्तित्व का कारण है)। इस विचार से ऋग्वेदिक संतो के लिए यह प्रचार करना आसान था - "सत्य एक है; साधु ‘इसे’ कई नामों से पुकारते हैं। दूसरे शब्दों में, "जैसे सभी नदियां सागर में जाती हैं, वैसे ही सभी धर्मों के निर्माता एक ही होते हैं" "एकम सत विप्रह बहुधा वदंती" : सत्य एक है, ऋषियों द्वारा इसे विभिन्न नाम दिया गया है। भारतीय संस्कृति का निर्माण, भारतीय सभ्यता की पूरी नींव पर आधारित मुख्य विषय है, इसके अंतहीन धर्म और संप्रदाय है । भारत इस "मूलभूत मूल्य" प्रणाली का समर्थन करता है, जिसे मैं अधिकांश भारतीयों द्वारा उनके धर्मों में देखता हूँ, विशेष रूप से इंडिक धर्मों में यह अ

सतान / शैतान या भगवान / अल्लाह – कौन है शक्तिशाली ?

ईसाई धर्म में, शीर्षक शैतान (हिब्रू: - शैतान), "विरोधक", बाइबल में मनुष्यों की आस्था को चुनौती देने वाले मानवी और दिव्य दोनों प्रकार की विभिन्न संस्थाओं का एक शीर्षक है। "शैतान" बाद में बुराई के व्यक्तित्व का नाम बन गया। ईसाई परंपरा और धर्मशास्त्र ने "शैतान" को मनुष्य के विश्वास को परखने के लिए ईश्वर द्वारा नियुक्त किए गए एक अभियुक्त में बदल दिया। इस्लाम धर्म में में : "डेविल ", अरबी में "शैतान" (अरब ईसाई और मुस्लिमों द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द) । इबलीस को स्वयम पर गर्व था और वह खुद को आदम से बेहतर मानता था, क्योंकि आदम मिट्टी से बनी थी और इबलीस धुएं रहित आग से बनाया गया था। [2] इस अवज्ञा के कारण, भगवान ने उसे अनंत काल तक जहन्नुम में (नरक/यातनागृह )रहने का शाप दिया था। यह चौंकाने वाला है कि अधिकांश मुसलमान और ईसाई धर्मी एक शैतान या डेविल के होने में विश्वास रखते हैं। 'शैतान लोगों

मंसूर अल-हलाज – एक योगी और रहस्यवादी

" तृण की तरह मैं कई बार उछल जाता हूं बहने वाली नदियों के किनारों पर कई हजार वर्षों तक मैं हर तरह के शरीर में रहता हूं और कर्म करता हूं। " - - - मंसूर अल-हलाज मंसूर अल-हलाज सभी जीवन या सभी सृजन और निर्माता के एक-ही होने का संदेश दे रहे थे। भारत में यह संदेश योगियों द्वारा लगातार हजारों सालों से बार बार प्रचारित किया गया है। अहं ब्रह्मस्मि (मैं ब्राम्हण हूं)। मैं वह हूं। मैं अल्लाह हूँ। मैं सत्य हूँ। इसी तरह का सन्देश वेद और उपनिषद में भी दिया गया है, और बुद्ध से ओशो तक और आदि शंकराचार्य से श्री श्री रवि शंकर द्वारा भी दिया गया है। हालांकि, इस्लामी इराक में, मंसूर अल-हलाज को जीवित जला दिया गया था, उन्हें एक विधर्मी कहा जाता है। सरमद, ने भी यही संदेश दिया था। औरंगजेब ने उसका सिर काट दिया था। अकेले भारत और उसके धार्मिक विश्वासों (इंडिक धर्मों) में ही कोई धर्मविघातक नहीं है, क

जैन परंपरा से लिया गया एक गीत

ऐसा कोई दिव्य प्राणी नहीं हैं, जिसे मैं जानता हूं, या कोई भगवान भी नहीं है, न स्वर्ग है, और न ही नरक, न रक्षक है, न ही इस ब्रह्मांड का कोई मालिक, न निर्माता, न विनाशक , घटनाओं का केवल एक नियम है, मैं अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेता हूं और उनके परिणामों की भी, प्राणियों के सबसे छोटे जीवों में भी जीवन शक्ति है मेरी ही तरह, मुझमें हमेशा इसी तरह करुणा हो सकती है, मैं किसी के भी, किसी भी तरह के नुकसान का कारण नहीं हो सकता, सच्चाई बहुआयामी है और उस तक पहुंचने के कई तरीके हैं, मुझे इस द्वंद्व में भी संतुलन मिल सकता है, मैं प्रार्थना करता हूं, मेरा अज्ञान नष्ट हो जाए, मेरी सच्ची आत्मा मुक्त हो, जीवन और मृत्यु के चक्र से, और मोक्ष प्राप्त करें! ~ "थेसियस का जहाज" से लिया गया गीत

भारत की भलाई के लिए, जाकिर नाइक को बौद्धिक रूप से ‘टूटा हुआ’ होना चाहिए

आशा है कि सभी ने "जाकिर नाइक" के बारे में खबर देखी है, जो ढाका के युवाओं के आईएसआईएस की तरफ जाने की ताकत है। इससे पहले, आईएसआईएस के लिए भर्ती हुई महिला, दुबई से गिरफ्तार की गई थी और प्रत्यर्पित की गई थी, वह जाकिर नायक से प्रभावित थी। अफसोस की बात है कि मेरे बहुत से शिक्षित मुस्लिम दोस्त ज़किर नायक के प्रशंसक हैं; उसके वीडियो जो कार्यालय में वितरित किये गए थे मैंने सुने है। मेरे मुस्लिम सहकर्मियों नेऋग्वेद से कई अंश साझा किये हैं जो जाकिर नाईक से प्रेरित हैं, और उनमे दावा किया गया है कि बुरखा पहनने के लिए मूलत: पहले हिंदुओं के लिए निर्धारित किया गया था (हां, आप मानें या नहीं!)। दूसरों ने तर्क दिया है कि ऋग्वेद में आर्य-दास युद्ध "धार्मिक युद्ध" थे। हर बार मैंने ग्रिफ़िथ की व्याख्याएं देकर इस मूर्खता को उन्हें बताया है। उसने एक व्याख्यान में, मुहम्मद को विष्णु का 10 वां अवतार (कल्कि!) बताया