सत्य से सरोकार: देखें और अनुभव करें बनाम यह जानने योग्य नहीं है |नीरज अत्रि |पैगंबरवाद का पूर्व पक्ष

‘नेचर ऑफ़ टरूथ’, हर किसी आइडियोलॉजी का ये क्लेम होता है की सच उनके पास है या उनको पता है दूसरे को नहीं पता। ये किसी भी केस मे एप्लीकेबल है। जो दोनों विचारधारा है, दोनों ट्रेडिशन है, उनमे भी ये इक़्वाली एप्लीकेबल है। लेकिन डिफरेंस क्या है? क़ि जो नेचुरल वाली थॉट प्रोसेस है उसके अंदर कहा जाता है के जो टरूथ है वो हमेशा से रहा है और वो हमेशा वैसा ही रहेगा न तो उसपे कोई व्यक्ति का प्रभाव पड़ता है ना टाइम का प्रभाव पड़ता है। वो शास्वत भी है और अपुरुष भी है, के उसको हुमंस चेंज नहीं कर सकते और टाइम चेंज नहीं कर सकता। फिर ये सच कैसे जाना जा सकता है?  उसके लिए हमारे यहां सबसे कॉमन है ‘जिन खोजा, तिन पाया’ जो ढूंढ़ने चलेगा उसको मिल जाएगा, जो नहीं जाएगा उसे नहीं मिलेगा। उसके लिए हम गौतम का एक्साम्पल दे सकते हैं। महावीर का एक्साम्पल दे सकते है। पतंजलि ऋषि का एक्साम्पल दे सकते है। के अलग अलग रास्ते हैं। आप उसको कर्मयोग बोल सकते है, कर्मयोग से भी मिल जाएगा। ज्ञान योग से मिल जाएगा। भक्ति योग पे चलेंगे उससे भी मिल जाएगा। फिर, और जो मैंन डिफरेंस आता है कि यहां पर अगर किसी ने बोला है के अगर आप योग आसान ये करोगे, इस तरह से योगा को फॉलो करोगे, ये अष्टांग योग है उसके रस्ते पे चलोगे तो ये आपको मिलेगा।

यहां पर हम इसको साइंस के साथ कमपे जो प्रकृति यर कर सकते है। साइंस मे हम क्या बोलते है के आपका जो क्लेम है क्या वो वेरीफाई किया जा सकता है, क्या उसे रिपीट किया जा सकता है। तो दोनों चीज़े यहां पर एप्लीकेबल हैं के अगर तो उसको वेरीफाई भी किया जा सकता है और रिपीट किया जा सकता है तो हम उसको एक्सेप्ट कर लेते हैं। वो एक सिध्दांत बन जाता है। अगर उसे रिपीट नहीं किया जा सकता तो सिध्दांत नहीं, आप उसको डिस्कार्ड कर सकते हैं। ऑन दी अदर हैंड, जब हम पैगम्बरवाद पे आते हैं, तो वहाँ पर, हर कुछ टाइम के बाद पैगम्बर नया जाता है। उसके पास मैसेज भी नया आ जाता है और वो आपस मे कई जगह पे एक-दूसरे से कन्फ्लिक्टिंग भी है और कॉन्ट्रडिक्टिंग भी है। तो जो सच है वो टाइम के साथ चेंज हो जाता है। प्रोफेट चेंज होता है, पैगम्बर चेंज होता है तो सच भी चेंज हो जाता है। और मैन बात क्या है के यहां पर आप उसको अपने आप नहीं जान सकते वो एक किताब मे लिखा हुआ है जो गॉड था या जो अल्लाह था उसने किताब भेजी, उस किताब मे मैसेज है, पैगम्बर के थ्रू आया था, आप ना तो पैगम्बर के इक्वल हो सकते है, ना प्रोफेट के इक्वल हो सकते हैं, ना सन ऑफ़ गॉड के इक्वल हो सकते हैं। बस आप जो सेकंड हैंड नौलेज है वो आप ले सकते हैं वहां से। इसको आप वेरीफाई नहीं कर सकते। अगर उसमे कोई स्टेटमेंट है, आप उसको लैब मैं जाके कही पर रिपीट नहीं कर सकते आप उसको, ये क्लेम जो है ये वेरीफाईएब्ल नहीं हैं।

और इसमें, जब हम बात करते हैं फेथ की, तो नोर्मली ये कहा जाता है के जब हम डिस्कशन करते हैं तो फेथ बेस्ड डिस्कशन होती है। अब उनफोरचुनैटली या फोरचुनैटली हमारे देश मे फेथ को कोई बहोत अच्छा वर्ड नहीं माना जाता। क्युकी उसको हम ऑलमोस्ट अंध्विश्वास के साथ जोड़ सकते है। के मेरा ये फेथ है, वो फेथ हो सकता है लेकिन उसको हम साइंटिफिक या लॉजिकल नहीं मानते हैं। इसलिए यहां पर जो ये षट्दर्शन की सारी परम्परा है कि न्यायशासतर चलता है कि क्या वो वेरीफाई किया जा सकता हैं, क्या उसमे लॉजिक हैं तो तो हम उसको एक्सेप्ट करेंगे अदरवाइज हम उसको फ्री हैं रिजेक्ट करने के लिए। लेकिन जो पैगम्बरवाद है उसके अंदर अगर आप रिजेक्ट करते हैं तो आप ब्लासफेमी करते हैं।

अब ब्लासफेमी एक ऐसा वर्ड है जो हमे हिंदी मे या संस्कृत मे कभी उसका कोई पैरलेल देखने को नहीं मिलता। क्युकी यहाँ पर क्वेश्चन किया जा सकता है और क्वेश्चन के बेसिस पर ही सारा चलता है। जो पुरे का पूरा उपनिषद वाला जो स्ट्रीम है वो क्वेश्चन के बेसिस पे चलता है। ऑन दी अदर हैंड, यहाँ पे क्लोज्ड है, के ये बुक है ‘इट हैज टु बी फॉलोड’। इसमें’डेयर इज नो इफ नो बट’ ‘डेयर इज नो क्वेश्चन’, आप क्वेश्चन पूछेंगे तो आपका गला काटा जा सकता है। क्यूकि आप फिर अदर मे चले जाते है। हालांकि, इसको अगर हमने कंट्रोल के हिसाब से देखना होतो पैगम्बरवाद बहोत अच्छा है। के इसमें वो, ‘लीव’ ही नहीं मिलता, वो जगह नहीं मिलती आपको डिस्कशन की। तो कंट्रोल सिस्टम बना रहता है।जबकि अगर आप, यहां क्वेश्चन वाली कैटागोरी मे आते हैं,जो नेचुरलिस्टिक ट्रेडिशन हैं, तो वहां पर क्वेश्चन पूछे जाते हैं और वहाँ पर आप कंट्रोल नहीं कर सकते है।


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