सनातन और पैगम्बरवाद में पाप की धारणा | नीरज अत्रि | The Concept Of Sin | Neeraj Atri

मनुष्य की स्थिति क्या है? (मनुष्य दो तरह के हैं – प्राकृतिक तथा पैगम्बरवादी) जिसमे की दोनों तरह के लोगो का दावा एक दूसरे का परस्पर विरोध करता है।

प्राकृतिक मनुष्यों का मानना है की सारे सच्चीदानंद है, जिनमे की सारे आनंद अंदर ही समाहित होते है। बस उसे ढूंढने की आवश्यकता है। और अगर वो ऐसा कर लेता है तो वो सच्चिदानंद की स्थिति में पहुंच जायेगा, जिसका तात्पर्य ये है की न ही उसे सुख परेशान कर सकता है नहीं दुःख परेशान कर सकता है।

दूसरा (पैगम्बरवादी ) इनके बिलकुल विपरीत है। उनका मानना है की सारे मनुष्य जन्म से ही पापी होते है, तथा इसका कारन ये बताया जाता है कि उनके पूर्वज आदम तथा इभ ने एक पाप किया था और चूकिं सभी उन्ही के संतान हैं ,और वे जन्म से ही इस पाप के बोझ को ढो रहे है।

अब इन दोनों में से एक का कहना है की सारे सच्चिदानंद है ,परन्तु यह भी परिस्थिति के अनुसार है। अगर आपके अचार विचार एवं व्यवहार अच्छे है, आप अच्छाई के रस्ते पर चलते है तबहिं आप सच्चिदानन्द की स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। दूसरी तरफ है की आप इस स्थिति को प्राप्त कर ही नहीं सकते,क्योंकि आप पापी है। इसको आप करम के सिद्धांत के साथ भी जोड़ सकते हैं. कर्म सिद्धांत बोलता है की अगर आपके कर्म अच्छे हैं य फिर आप कर्मों से ऊपर उठ जाते हैं,तभी आप सचिदानंद की स्थिति में आते हैं। दूसरी ओर का कहना है की आपके पूर्वज आदम तथा इभ ने एक पाप किया था ,और उसका फल आप तक संचारित होकर आया है ,इसलिए आप पापी हो। यहाँ सबसे प्रमुख अंतर प्रक्रितिक विचार प्रक्रिया है ,की मेरे कर्मो के फल आप नहीं मैं ही भुगतूँगा। वहीँ दूसरी तरफ है की ,भले ही अपने कोई पाप नहीं किया ,परन्तु आप पहले से ही उन पापों को भुगत रहे हैं।

दूसरा अंतर यह है की अगर मैंने कुछ गलत किया है तो उसकी सजा भी मुझे ही मिलेगी।उसके दुःख भी मैं ही भोगने वाला हूँ। परन्तु पैगंबरवाद में है कि ,चुकी पाप अपने किये हैं तो आप पापी हो ,लेकिन ईसा मसीह ने शूली पे लटक के आपके उन सभी पापों को धो दिया है।

असल में मैं गाँधी जी की कुछ टिप्पणियाँ पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने ईसाई धर्म के साथ अपने संघर्षों का उल्लेख किया है। जिसमे उन्होंने विशेष रूप से एक आदमी का उदहारण दिया था कि “वो मुझे ईसाइयों में बदलना चाह रहे थे ” तभी इन्होने कहा कि “मैं बदलना नहीं चाहता”। फिर उन्होंने इनको बाइबिल दी.गांधीजी ने कहा कि “मैं बाइबिल पढ़ता रहा लेकिन मैं ऊबने लग गया था। मैं बस इसके माध्यम से चला गया ,बस दिखाने के लिए कि मैंने बाइबिल पढ़ी है। तब उनमे से एक व्यक्ति ने कहा कि आपका धर्म बेकार है जिसमे की आपको प्रत्येक दिन मेहनत करनी पड़ती है ,साधना करनी पड़ती है। हमारा धर्म बहुत ही अच्छा है ,जिसमे की हमें बस स्वीकारना पड़ता है कि “ईसा मसीह हमारे रक्षक हैं ,मैं कोई भी अपराध करूँगा ,वो मुझे बचा लेंगे ” गांधीजी अपनी डायरी में भी लिखते हैं कि उस व्यक्ति ने ऐसा करके देखा है। वह बहुत सारे अपराध कर रहा था परन्तु उसकी अन्तरात्मा उसे कभी नहीं धिक्कारती थी। वह बोलता था की ईसा मसीह ने मुझे बचा लिया है।

व हिसाब से हम अगर पूर्णतया स्वार्थी होकर देखे तो उस स्थिति में भी इसे से स्वीकार सकते हैं,इसे अगर पाप करने का मन करता है तथा मन स्वच्छ रखने का मन करता है तो बोलो कि ईसा मसीह मुझे बचा लेंगे।

Leave a Reply