सोमवार, अक्टूबर 14"Satyam Vada, Dharmam Chara" - Taittiriya Upanishad

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[Q/A] पैगंबरवाद का पूर्व पक्ष — नीरज अत्रि द्वारा एक व्याख्यान

[Q/A] पैगंबरवाद का पूर्व पक्ष — नीरज अत्रि द्वारा एक व्याख्यान

Main Talk: https://www.youtube.com/watch?v=YTg-I... पैगम्बरवादी मज़हबों के आने से पहले विश्व की विभिन्न सभ्यताओं का संक्षिप्त परिचय देने के पश्चात पैगम्बरवादी विचारधाराओं की तुलना भारतीय विचारधाराओं से की जाएगी। तुलनात्मक अध्ययन के मुख्य बिंदु हैं:- मानवजाति का विभाजन (मोमिन बनाम काफ़िर) समय का विभाजन (जाहिलयत बनाम नूर) पुनर्जन्म के प्रति विचार महिलाओं की स्थिति प्रकृति से सम्बन्ध मोक्ष बनाम जन्नत https://www.youtube.com/watch?v=Sl0-7TBXGkc
पैगंबरवाद का पूर्व पक्ष — नीरज अत्रि द्वारा एक व्याख्यान

पैगंबरवाद का पूर्व पक्ष — नीरज अत्रि द्वारा एक व्याख्यान

पैगम्बरवादी मज़हबों के आने से पहले विश्व की विभिन्न सभ्यताओं का संक्षिप्त परिचय देने के पश्चात पैगम्बरवादी विचारधाराओं की तुलना भारतीय विचारधाराओं से की जाएगी। तुलनात्मक अध्ययन के मुख्य बिंदु हैं:- -- मानवजाति का विभाजन (मोमिन बनाम काफ़िर).-- समय का विभाजन (जाहिलयत बनाम नूर).-- पुनर्जन्म के प्रति विचार.-- महिलाओं की स्थिति. -- प्रकृति से सम्बन्ध.-- मोक्ष बनाम जन्नत. https://www.youtube.com/watch?v=YTg-Ixp09Ko&t=644s वक्ता के विषय में: – श्री नीरज अत्रि भौतिक विज्ञान के अध्यापक हैं और भारतीय इतिहास अनुसंधान एवं तुलनात्मक अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष हैं।
भारत को आदि शंकर का अभिनंदन क्यों करना चाहिए?

भारत को आदि शंकर का अभिनंदन क्यों करना चाहिए?

Source: - Swarjya Magazine. मनुष्य चिरकाल से ईश्वर को अपने हृदय में वास करने के लिए प्रार्थना करता आया है । परंतु आदि शंकराचार्य ने इसको ईश्वर के प्रति एक उपकार कहने का साहस किया । शंकराचार्य जयंती के उपलक्ष्य में जो कि पिछले सप्ताह बीती है आइए इस दर्शिनिक के विचारों के बारे में चिंतन करते हैं। शंकराचार्य एक प्रथम श्रेणी के कवि भी हैं जिनको संस्कृत के महान कवियों में गिना जाता है। पर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शंकराचार्य  एक आदर्श रूप हैं जिसमें सनातन धर्म का सार समाया हुआ है। उनकी कृतियाँ एक ओर एक स्वस्थ शंकावाद को दर्शित करती है तो वहीं वे अनुभव को विश्वास से अधिक प्राथमिकता देती हैं। वे धार्मिक ग्रंथो के अद्ध्ययन को ना तो आवश्यक मानते हैं ना ही सम्पूर्ण। वे  कर्मकांडों को स्थान तो देते हैं पर साथ ही उनकी सीमाओं के बारे में चेतावनी भी देते हैं। वे यह भी नहीं कहते की सिर्फ़ एक मार्ग ही
धार्मिक ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं है

धार्मिक ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित करने की आवश्यकता नहीं है

https://www.youtube.com/watch?v=-tFbVwUqqlU&t=5s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 हम एक ऐसी सभ्यता हैं जिसके मूल में ज्ञान की बृहत् खोज करना है। हिन्दू धर्म जैसा कोई और धर्म नहीं है। यह ज्ञान परंपराओं की धारा का एक समूह है जिसमे आंतरिक और बाह्य दोनों दुनिया के ज्ञान की खोज चल रही है। वस्तुतः हम सदा से ऐसे ही थे जिसके अंतर्गत हम इन दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान में थे। इसलिए मौलिक रूप से हम ज्ञान परंपरायें हैं जो कई अलग-अलग तरीकों से प्रेषित होती हैं, क्योंकि ज्ञान को ग्रंथों के माध्यम से प्रसारित नहीं करना पड़ता है। आप अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखाते हैं। क्या आप उसे इसके लिए किताब देते हैं? सीखने के विभिन्न तरीके हैं, ग्रंथ भी एक तरीका हो सकता है, लेकिन ग्रंथ ही एकमात्र तरीका नहीं है। और यह निश्चित रूप से प्रमुख तरीका नहीं है। आज भी मनुष्य मूलत: अवलोकन, पुनर
शिव आगम का अवतरण कैसे हुआ?

शिव आगम का अवतरण कैसे हुआ?

https://www.youtube.com/watch?v=3Tw4IaqZxeE&t=5s?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 शिव आगम वे आगम हैं जो स्वयं महादेव द्वारा प्रकट किए गए थे। कामिका आगम, जो सबसे महत्वपूर्ण अगमों में से एक माना जाता है, में इसका वर्णन पाया जाता है। इसमें महादेव को पंचमुख के रूप में वर्णन किया गया है - सद्योजात, वामदेव, अघोरा, तद्पुरुष और ईशान। महादेव के इन चेहरों में से प्रत्येक में पांच और मुख थे। इन पाँच में से प्रत्येक मुख से लौकिक, वैदिक, आध्यात्मिक, अतिमार्ग और मंत्र आगम प्रकट हुए। ये केवल नाम नहीं हैं, बल्कि आगम की श्रेणियां हैं। इस प्रकार कुल 25 मुख बनते हैं। सद्योजात मुख से 24 रूपों वाला भूत तंत्र (उदाहरण - कौल तंत्र) प्रकट हुआ। वामदेव मुख से 24 रूपों वाला वामतंत्र प्रकट हुआ; अघोर मुख से भैरव तंत्र प्रकट हुआ; तत्पुरुष मुख से 24 रूपों वाला गरुड़ तंत्र और इशान मुख, जो सबसे महत्वपूर्ण है औ
[Q&A] ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ एवं ‘आयुर्वेद का महत्व’

[Q&A] ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ एवं ‘आयुर्वेद का महत्व’

गुरुकुल शिक्षा पद्धति': https://youtu.be/Y3zYBxpm0iU क्या थी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली? कितनी प्रकार की पद्धतियाँ होती थीं इस प्रणाली में? कहाँ से आरम्भ होती थी शिक्षा? क्या शिक्षा केवल विषय-ज्ञान तक सीमित थी या इसका कोई अलौकिक अभिप्राय भी था? जानिए श्री मेहुल आचार्य के व्याख्यान में | आयुर्वेद का महत्व : https://youtu.be/UixTp3YiFHI आयुर्वेद के अनुसार आहार ही औषधि है| श्रीमती जिज्ञासा आचार्य हमें बता रही हैं किस प्रकार पदार्थों के गुणों के अनुकूल पथ्य-अपथ्य का पालन आवश्यक है; कैसे भोजन पकाते समय न केवल पात्रों, पदार्थों तथा स्थान की स्वच्छता व शुद्धता महत्त्वपूर्ण है, अपितु पकाने वाले के भाव की शुद्धता और पवित्रता उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं जो हमारे भोजन को, हमारे स्वास्थ्य को और अंततः हमारे मन को प्रभावित करते हैं| https://www.youtube.com/watch?v=jVw5xFwc8Wc?cc_lang_pref=hi&cc_
इसाई पंथ और भारत – डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन का व्याख्यान

इसाई पंथ और भारत – डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन का व्याख्यान

संपूर्ण विश्व में प्रेम व शान्ति का स्वरुप माने जाने वाले इसाई धर्म के विस्तार का इतिहास रक्त से सना है, ये तथ्य कम ही लोग जानते हैं| यूनान, रोम व माया जैसी कई प्राचीन संस्कृतियाँ इसाई मिशनरियों के हाथों जड़ से मिटा दी गयीं| अनगिनत देशों की भोली-भाली प्रजा का जबरन धर्मान्तरण किया गया और जो न माने उन्हें अत्यंत बर्बरता से प्रताड़ित कर मौत के घाट उतार दिया गया| भारत में सर्वप्रथम इसाई शरणार्थी बन कर आये| परन्तु पुर्तगालियों के आगमन के साथ ‘गोवा इन्क्विज़िशन’ नामक क्रूरता का जो वीभत्स नरसंहार शुरू हुआ वो दिल दहलाने वाला था| उसके पश्चात् फ्रांसीसी, डच, अंग्रेज़, ये सभी विदेशी इसाई धर्म के विस्तार के लिए निर्दोष भारतवासियों पर अत्याचार करते रहे| अपने सृजन व्याख्यान “इसाई पंथ और भारत” में श्री सुरेन्द्र जैन बड़ी स्पष्टता से हमें अवगत कराते हैं कि किस प्रकार आज़ादी के पश्चात् इसाई मिशनरी छल-बल,
सत्य में श्रद्धा की आहुति ही यज्ञ है !!!

सत्य में श्रद्धा की आहुति ही यज्ञ है !!!

श्री राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी जी द्वारा---- शतपथब्राह्मण ११-२-२-४ में एक प्रसंग है, तद्वैतज्जनको वैदेह: याज्ञवल्क्यं प्रपच्छ वेत्थाग्निहोत्रं ? विदेहजनक ने याज्ञवल्क्य से पूछा कि क्या आप अग्निहोत्र के तत्त्व को जानते हैं ? जी हां ,जानता हूं । किस पदार्थ से हवन करते हो ? दूध से ! यदि दूध न मिले तब किससे हवन करोगे ? जौ-चावल से ! यदि जौ-चावल न मिले तब किससे हवन करोगे ? तब जो कोई जंगली अनाज मिलेगा उससे ! यदि जंगली- अनाज भी न मिले तब ? तो जंगली फलों से ! यदि वे भी न हों ,तब ? तब केवल जल से ! यदि जल भी न हो तब ? स होवाच न वा इह किंचनसीदथैतदहूयतैव सत्यं श्रद्धायामिति । जब केवल वेद ही था , और यह सब क्रियाकलाप नहीं था ,तब सत्य में श्रद्धा की आहुति से ही हवन होता था । सत्य में श्रद्धा की आहुति ही यज्ञ है ! तब जनक ने कहा कि, हे याज्ञवल्क्य ! आ
संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

संत रैदास जी को जब इस्लाम को अपनाने को कहा गया

https://www.youtube.com/watch?v=gLfm0Neh8Xc?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 संत रैदास जी का एक यह हैं, जब उनको दबाव डाला गया कि तुम इस्लाम क़ुबूल करो तो उन्होंने लिखा :- वेद धरम सबसे बड़ा अनुपम सच्चा  ज्ञान I फिर मैं क्यों छोड़ू इसे पढ़लू झूट कुरान वेद धरम छोड़ू नहीं कोसिस करो हज़ार I तिल तिल काटो चाही गौदो अंग कतार I अब यह बताईये कि जो समाज में सबसे निचली श्रेणी में खड़े हैं वह कहतें हैं वेद,धरम सबसे बड़ामैं इसे किसी भी कीमत पर त्याग नहीं सकता I क्योकि वह जो अनुपम ज्ञान हैं और आप कहतें हैं कि छोटी जातियों के साथ इतना अन्याय हुआ I अगर अन्याय हुआ होता तो क्या रैदास वेद धरम और कहतें हैं कि तुम मेरा अंग काटो ? चाहे कटार से गोत दालों तभी मैं नहीं त्यागूंगा ?
रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

रामानंदाचार्य ब्राह्मण वादी नहीं थे

https://www.youtube.com/watch?v=BFGiGXKAjs8?cc_lang_pref=hi&cc_load_policy=1 स्वामी रामानंद ने “वैष्णव मताब्ज भास्कर” में लिखा हैं : प्राप्तम पराम सिद्धधर्मकिंचनो जानो द्विजातिरछां शरणम हरीम व्रजेत परम दयालु स्वगुणानपेक्षित क्रियाकलापादिक जाती बन्धनं सिद्धि प्राप्ति के लिए धन का कोई महत्त्व नहीं है, जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह किसी भी जाती, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो, हरी के शरण में जाने का अधिकारी है I कमर्काण्ड और जाती बंधन का कोई अर्थ ही नहीं है I आगे देखिये वह क्या कहतें है I वो कहतें हैं कि पंचायुध चिन्ह से युक्त कोई भी व्यक्ति जिसके शरीर पर पंचायुध में से किसी एक आयुध का निशान हैं, वह साक्षात विष्णु का रूप है I वह पवित्र से पवित्र व्यक्ति को पावन कर सकता है I तो क्या स्वामी जी शक्त-अशक्त, संपन्न-विफन्नं, शिक्षित- निरक्षर, ब्राह्मण-शूद्र, राजा- रैंक, चांडाल, स